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जगन्नाथ पुरी की अनाध्यात्मिक यात्रा

अक्टूबर 11, 2011

पुरी अथवा जगन्नाथ पुरी, ओडिशा प्रान्त में, पूर्वी समुद्र तट पर अवस्थित हिन्दुओं के आस्था का केंद्र है. इसे ओडिशा की सांस्कृतिक राजधानि भी माना जाता है. चार धामों में से एक, और आदि शंकराचार्य के चार पीठों में भी एक. हमलोग सपरिवार गए थे. यात्रा का उद्देश्य महिलाओं के लिए धार्मिक रहा हो, परन्तु पुरुष वर्ग के लिए पर्यटन तथा मौज मस्ती ही प्राथमिकता रही. अलबत्ता संतुलन बनाये रखने का पूरा प्रयास किया गया. भुबनेश्वर को हम लोगो ने अपना केंद्र बनाया था. एक सुबह चाय नाश्ते के बाद वहीँ से एक बोलेरो लेकर  पुरी के लिए निकल पड़े. दूरी थी ७० किलोमीटर.

रास्ता ग्रामीण अंचलों में से होकर गुजरता है. वहां का ग्रामीण माहौल कुछ भिन्नता लिए था. तटीय क्षेत्र होने के कारण नारियल के पेड़, सुपारी के पेड़ आदि भी दिखे परन्तु वे उतने घने नहीं थे जितना हम पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में देखते हैं. धान के खेतों से एक अजब सोंधी सोंधी खुशबू आ रही थी. रास्ते में एक अच्छा सा ढाबा दिखा तो हम लोगोंने सोचा क्यों न यही खान पान भी हो जाए. गाडी रोक दी गयी और ढाबे के बागीचे में ही टेबल जमाकर विश्राम किया. आधे घंटे में ही खाना लग गया. रोटी, चावल, सब्जी, दाल सभी था.

ढाबे के प्रांगण में गाडी के ऊपर भतीजा “गिरीश”

खा चुकने  के बाद कुछ आराम किया गया और फिर अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले. ढाई बजे तक पुरी पहुँच चुके थे. वहां हमारे ठहरने  की व्यवस्था एक बेंक के अवकाश गृह में कर रखी थी परन्तु जब वहां पहुंचे तो केयरटेकर  महोदय नदारद. महिलायें रिसेप्शमें गे सोफों में लुढ़क गयीं और हम लोग केयरटेकर के तलाश में लग गए. कुछ देर बाद महोदय का आगमन हुआ और बिना कुछ देखे दाखे कह दिया कि कोई कमरा आप लोगों के लिए बुक नहीं है. बड़ी खोफ्त हुई और तत्काल उनके स्थानीय अधिकारी से बात की गयी. हम लोगों के बात चीत को सुनकर ही केयरटेकर महोदय ने हमें कमरे सुलभ कराने की पेशकश की और इतने में उसे भी फोन आ गया और वह माफ़ी मांगने लगा. अंततः हम सबके लिए ए सी वाले कमरे आबंटित हो गए. कमरे तो बहुत ही स्वच्छ और सुन्दर थे. वैसे अवकाश गृह का भवन भी बड़ा शानदार था और एकदम समुद्र तट के करीब. शाम तक विश्राम कर हम लोग जगन्नाथ मंदिर के लिए निकल पड़े.               अवकाश गृह के छत पर भतीजी “गौरी” – टाईटानिक के केट की नक़ल करते हुए 

मेरे लिए तो यह पहला अवसर नहीं था. हमने सबको आगाह कर दिया कि पंडों के मुह न लगें हम निपट  लेंगे. जैसी आशंका थी वैसा ही हुआ. एक के बाद दूसरा कोई पंडा पीछे लग जाता. क्योंकि मुझे ओडिया आती थी, हमने उनसे कह दिया कि न तो हमें पूजा करानी है न ही तर्पण आदि. कल सुबह ही इस बारे में सोचेंगे. तब एक ने हमारे ठिकाने के बारे में जानना चाहा तो हमने कह दिया, सुबह यहीं मिलेंगे. उन पंडों से पिंड छुडाकर हम लोग अन्दर घुसे. जगमोहन (मंडप) में एक पंडा कुछ ऊँचाई पर बैठा हुआ था. फटे बांस का एक २ फीट लम्बा टुकड़ा अपने हाथ में रखा हुआ था. हर श्रद्धालु के सर पर वह उस बांस से मारता जिससे आवाज होती थी. यह हमें रास नहीं आया. हमारा जत्था जब आगे बढ़ रहा था तो हमने उस पण्डे पर नाराजगी प्रकट करते हुए वैसा करने से मना कर दिया था. दूसरे मंदिरों की तुलना में यहाँ का गर्भगृह काफी विशाल है. बलभद्र, सुभद्रा तथा जगन्नाथ की प्रतीकात्मक काष्ट मूर्तियों के दर्शन किये गए. कुछ पण्डे तो मूर्तियों के बगल ऐसे बैठे थे मानो वे भी मोक्षदाता  ही हों. दर्शन से निपट कर बाहर आना हुआ और तीन बार मंदिर की परिक्रमा भी कर ली. चारों तरफ अनेकों छोटे छोटे मंदिर बने थे. बगैर रुके उनके सामने से निकलते समय शीश भर नवा लेते. जगन्नाथ एंड कम्पनी से इस अनौपचारिक मुलाक़ात के बाद, अपने ठिकाने लौट आये. रात के खाने के लिए अवकाश गृह में ही व्यवस्था कर ली गयी थी.  रात सोने से पहले हम लोगोंने तय कर लिया था कि सूर्योदय के पहले, समुद्र तट पर चलेंगे.

दूसरे दिन प्रातः बिस्तर पर कोफ्फी उपलब्ध थी. हम लोगों के कमरे कुछ दूर दूर थे. सबको उठते उठाते समय लग ही गया. सूर्य देव हमारा इंतज़ार थोड़े ही करते. भागे भागे समुद्र तट पर पहुंचे. सूर्योदय तो कब का हो चला था. फिर भी क्षितिज को देख और ठंडी हवाओं के झोंकों का स्पर्श पा कर मन प्रफुल्लित ही हुआ. दूर एक नाव रेत पर पड़ी थी. बच्चों ने उसे धकेल कर समुद्र में उतार दिया. इतने में वह मछुवारा आ पहुंचा जिसकी वह नाव थी. उसे बच्चों ने ही पटा लिया लेकिन माताओं द्वारा चिल्लपों किये जाने के कारण वे समुद्र में जाने का दुस्साहस नहीं कर सके. किनारे रेत पर टहलते हुए हमलोगों का सामना एक रेत की कलाकृति से हो गया जिसके लिए पुरी को सुदर्शन पटनायक नामके कलाकार ने ख्याति दिलाई. वैसे स्वयं पटनायक जी को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है और अन्य देशों में जाकर भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया और पुरस्कार बटोरे.

हाय रे मुमताज, किसने बना  दिया तुझे शूर्पनखा 

वहां शाहजहाँ और मुमताजमहल बने थे. पीछे एक संगमरमर के ताज महल को भी प्रतीकात्मकता के लिए रखा गया था. वास्तव में कलाकृति तो बेहद सुन्दर थी. हमारे भाई साहब को वह देख जोश आ गया और अपनी कारीगरी में लग गए. कुछ देर के प्रयास से कुछ किलेनुमा निर्माण दिखा. उसकी पत्नी ने पूछा ये अन्दर गड्ढा  क्यों बना दिया तो जवाब था “अपने लिय कब्र बना रहा हूँ”. बहू ने फिर पूछा “और मेरे लिए?” बात बढ़ने की गुंजाईश बन रही थी इसलिए हमने बहू को आगे कुछ न बोलने का आग्रह किया.

रेत से रेत पर कलात्मक अभिव्यक्ति के सम्बन्ध में पुरी में एक मिथक प्रचलित है. १४ वीं शताब्दी में बलराम दास नामके एक कवी हुए थे जिन्होंने  “दण्डी रामायण”  रचा था.  रथ यात्रा के समय वे एक बार जगन्नाथ जी के रथ के ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे ताकि प्रभु के दर्शन कर सकें. पंडों ने उन्हें अपमानित कर नीचे उतर जाने के लिए विविश कर दिया. उनका कवि ह्रदय विचलित हो गया. वे सीधे समुद्र तट पर (महोदधि) गए और रेत से जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की आकृतियाँ बनायीं और तल्लीन होकर अराधना करने लगे. उनकी भक्ति  की शक्ति ही कहें, रथों के ऊपर रखे सभी विग्रह अचानक गायब होकर समुद्र तट पर बलराम दास के सम्मुख आ पहुंचे. लोगों का मानना है कि इस कला (रेत पर) का उद्भव वहीँ से हुआ था. चलिए मिथक ही तो है. जहाँ कहीं भी रेत की ढेर लगी हो, वहां हम बच्चों को घरोंदा या कुछ अपने तरीके से कलाकृतियाँ बानाते देखते ही हैं. फिर भगवान् राम ने भी तो रामेश्वरम में रेत से शिव लिंग बनाकर उसकी पूजा की थी.

कुछ देर तक समुद्र तट की ठंडी हवाओं का आनंद प्राप्त कर लौट पड़े. इतने में महिलाओं ने दुबारा मंदिर जाने की जिद की. उनकी बात भी मान ली गयी और कह दिया कि वहां पंडा मिलेगा तो बोल देना साहब लोग अभी आने ही वाले हैं. हम लोग बाज़ार में घूम कर समय बिताते रहे. कहीं एक घंटे के बाद महिला वर्ग भी हमसे आ मिला. बाज़ार में कई प्रकार के हस्त शिल्प उपलब्ध थे. एक बहू पीतल के बर्तनों की दूकान में घुस गयी. वहां उसे एक पीतल का ४ फीट ऊंचा दिया दिख गया. उसके अलावा भी पीतल/कांसे की बनी बहुत सारी चीजें थीं. वहां सौदा नहीं पटा. अब क्योंकि पेट में चूहे कूद रहे थे, हम लोगों ने एक होटल  में नाश्ता किया और अपने ठियां की ओर चल पड़े. धूप बड़ी तेज होने के कारण पसीना भी खूब छूट रहा था इसलिए और कहीं जाने की इक्षा ही नहीं हुई. दुपहर खाने के बाद हम लोग कोणार्क होते हुए रात तक भुबनेश्वर पहुँच गए.

जगन्नाथ पुरी का मंदिर ଜଗନ୍ନାଥ ପୁରୀ

अक्टूबर 2, 2011

एक महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में पुरी (जगन्नाथ पुरी) का उल्लेख सर्वप्रथम महाभारत के वनपर्व में दृष्टिगोचर होता है और इस क्षेत्र की पवित्रता का बखान कूर्म पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, आदि में यथेष्ट रहा है. पुरी के सांस्कृतिक इतिहास के ठोस प्रमाण ७ वीं सदी से ही उपलब्ध हैं जब “इंद्रभूति” ने बौद्ध धर्म के “वज्रायन” परंपरा की नीवं डाली थी. कालांतर में पुरी वज्रायन परंपरा का पूर्वी भारत में एक बड़ा केंद्र बन गया. इंद्रभूति ने बुद्ध स्वरुप जगन्नाथ की आराधना करते हुए  ही अपने प्रसिद्द ग्रन्थ “ज्ञानसिद्धि” की रचना की थी. इसी ग्रन्थ में अन्यत्र भी जगन्नाथ का उल्लेख हुआ है. इसका तात्पर्य तो यही हुआ कि उन दिनों जगन्नाथ का संबोधन गौतम बुद्ध के लिए ही किया जाता रहा है. इंद्रभूति ने वज्रायन पर कई अन्य महत्त्व पूर्ण ग्रंथों की भी रचना की थी. जगन्नाथ के बुद्ध होने का एहसास जन मानस पर बहुत ही गहराई से उतरा  हुआ था. विद्वानों का मत  है कि जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा वास्तव में बौद्ध धर्म के “बुद्ध”, “संघ” और “धर्म” (धम्म) के परिचायक हैं. १५ से लेकर १७ वीं सदी के मध्य भी ओडिया साहित्य में इसकी अभिव्यक्ति हुई है.

आध्यात्मिक विजय यात्रा पर निकले आदि शंकराचार्य (सन ७८८ – ८२०) का पुरी में आगमन हुआ. अपनी विद्वत्ता से उन्होंने वहां के बौद्ध मठाधीशों के दांत खट्टे कर दिए और उन्हें सनातन धर्म की ओर आकृष्ट करने में सफल रहे तथा आत्मसात कर लिए गए. शंकराचार्य जी ने यहाँ अपना एक पीठ भी स्थापित किया जिसे गोवर्धन पीठ कहते हैं. इस पीठ के प्रथम जगतगुरु के रूप में, शंकराचार्य जी के चार शिष्यों में से एक, पद्मपदाचार्य (नम्पूतिरी ब्राह्मण) को नियुक्त किया गया था. शंकराचार्य जी ने ही जगन्नाथ की गीता के पुरुषोत्तम के रूप में पहचान घोषित की थी. संभवतः इस धार्मिक विजय के स्मरण में ही श्री शंकर एवं पद्मपाद की मूर्तियाँ जगन्नाथ जी के रत्न सिंहासन में स्थापित की गयीं थीं. मंदिर द्वारा  ओडिया में प्रकाशित अभिलेख “मदलापंजी” से ज्ञात होता है कि पुरी के राजा दिव्य सिंह देव द्वितीय (१७९३ – १७९८) के शासन काल में उन दो मूर्तियों को हटा दिया गया था.

१२ वीं सदी में पुरी में श्री रामानुजाचार्य जी का आगमन हुआ. उनके आगमन तथा उनकी विद्वत्ता का असर यह हुआ कि तत्कालीन राजा चोलगंग देव जिसके पूर्वज ६०० वर्षों से परम महेश्वर रहे, उनकी आसक्ति वैष्णव धर्म के प्रति हो गयी. कई वैष्णव आचार्यों ने पुरी को अपनी कर्मस्थली बनायीं, मठ स्थापित किये और शनै शनै पूरा ओडीसा ही वैष्णव होता गया.

यहाँ एक बात जो महत्वपूर्ण है, शंकराचार्य जी ने चार पीठों की स्थापना की थी. उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में गोवर्धन तथा पश्चिम में द्वारका. चार धामों की परिकल्पना किंचित भिन्न है. चार धामों में तीन तो उन्हीं में से हैं केवल  श्रृंगेरी के बदले रामेश्वरम को एक धाम माना जाता है.

एक कहानी के अनुसार जगन्नाथ की आराधना एक सबर आदिवासी “विश्वबसु” के द्वारा “नील माधव” के रूप में की जाती रही. साक्ष्य स्वरुप आज भी जगन्नाथ पुरी के मंदिर में अनेकों सेवक हैं जो  “दैतपति” नाम से जाने जाते हैं. इन्हें आदिवासी मूल का ही माना जाता है. ऐसी परंपरा किसी अन्य वैष्णव मंदिर में नहीं है.                     बलभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ का निम्न चित्र विकिपीडिआ से है

एक दूसरी कहानी के अनुसार राजा “इन्द्रद्युम्न” को स्वप्न में जगन्नाथ जी के दर्शन हुए और निर्देशानुसार समुद्र से प्राप्त काष्ट से मूर्तियाँ गढ़ी गयी थी. उस राजा ने ही जगन्नाथ पुरी का मंदिर बनवाया था. ऐतिहासिक प्रमाण कुछ और ही कहते हैं. मूलतः पुरी के वर्त्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण वीरराजेन्द्र चोल के नाती और  कलिंग के शासक अनंतवर्मन चोड्गंग (१०७८ – ११४८)  के द्वारा करवाया गया था. राजा आनंग भीम देव ने सन ११७४ में इस मंदिर के विस्तार का कार्य किया जो १४ वर्षों तक चला. मंदिर में स्थापित बलभद्र, जगन्नाथ तथा सुभद्रा की काष्ट मूर्तियों का पुनर्निर्माण १८६३, १८९३, १९३१, १९५०, १९६९ तथा १९७७ में भी किया गया था. पूर्व में उसी स्थल पर किसी जीर्ण शीर्ण जगन्नाथ (बौद्ध)  मंदिर के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता.

जगन्नाथ  मंदिर लगभग ४,००,००० वर्ग फीट के वृहद् क्षेत्र में व्याप्त है और इसके प्रांगण में ही १२० से अधिक दूसरे देवी देवताओं  के आवास भी हैं. ओडिशा में यह सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है जिसके शिखर की ऊँचाई १९२ फीट है. मंदिर के चारों तरफ की दीवारे २० फीट ऊंची हैं. साधारणतया हर मंदिर में एक मंडप और फिर गर्भ गृह रहता है. यहाँ कुछ विशिष्ट है. एकदम बाहर की तरफ भोगमंदिर, उसके बाद नट मंदिर (नाट्यशाला) फिर जगमोहन अथवा मंडप जहाँ श्रद्धालु एकत्रित होते हैं और अंत में देउल (गर्भगृह) जहाँ जगन्नाथ जी अपने भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा के साथ विराजे हुए हैं. 

पुरी में हर वर्ष जुलाई के महीने में जो विश्व प्रसिद्द रथ यात्रा आयोजित की जाती है, यह भी एक बौद्ध परंपरा ही है. ऐसे ही गौतम बुद्ध के दन्त अवशेषों को लेकर  रथ यात्रा का आयोजन होता है.

हम तो चले थे अपनी पुरी यात्रा के बारे में कुछ बताने परन्तु अपनी कमजोरी को नियंत्रित नहीं रख सके और आलेख खिंच गया. एक और पोस्ट का जुगाड़ बन गया!