Archive for the ‘Rajasthan’ Category

निठल्लों की पुष्कर यात्रा

मई 5, 2011

आलेख:प्रीतम अय्यर,
कोलाररोड, भोपाल.

अभी कुछ ही दिन हुए एक परीक्षा देने अजमेर जाना हुआ था. भोपाल से अजमेर के लिए सीधी ट्रेन सेवा है. यहाँ गाडी शाम ४.५० को छूटती है और सुबह अजमेर पहुँच जाती है. पहले से रिसर्वेशन करवा रखा था. बर्थ तो मिल गयी. कुछ देर बाद गाडी के अन्दर ही कुछ और साथी मिले जो कोचिंग में मेरे साथ रहे हैं. उनमें से कई लोग वेट लिस्टेड थे. इन सभी बेरोजगारों को देख कुछ अपनापन लगा. हमने अपनी ओर से प्रस्ताव दिया कि कोई एक हमारे साथ ऊपर की बर्थ पर आ जाए. सब ने ऐसा ही किया. फिर गपशप शुरू हुई. अजमेर कभी   जाना नहीं  हुआ था. सब का यही हाल था. हमने तय किया कि इकट्ठे रुकेंगे. गाड़ी के रवाना होने के बाद पता चला कि उसमें पेंट्री नहीं है. गाडी जब उज्जैन पहुंची तो जान में जान आई. वहां पुड़ी सब्जी मिल रही थी. टमाटर का सूप भी सब ने पिया. यहाँ गाडी बहुत देर रुकी रही क्योंकि एक गाडी इंदौर से भी अजमेर  के लिए  चलती  है और  उसके  डिब्बे  हमारी गाडी से जोड़े  गए.

हम लोग अजमेर तो शनिवार तडके पहुँच गए थे परन्तु होटल ढूँढने में २ घंटे लग गए. होटल तो बहुत सारे थे लेकिन किराया बहुत ज्यादा लगा. आखिर एक होटल में डोर्मीटरी   मिली जहाँ ८ बिस्तर लगे थे. प्रति व्यक्ति किराया १५० रुपये प्रति दिन था. क्योंकि हम सात लोग थे इसलिए यह हमें जंच गयी. फ्रेश होकर नाश्ता किया और पैदल निकल पड़े थे. पूरा दिन भर था, परीक्षा इतवार को थी तो सबने सोचा क्यों न पुष्कर घूम आयें. लेकिन बस अड्डे तक ३/४ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था. पुष्कर वहां से १२ किलोमीटर ही था बस भी आराम से मिल गयी थी.

पुष्कर पहाड़ियों से घिरी एक घाटी है और यहाँ के झील का नाम ही पुष्कर है. पुष्कर की झील में नहाना ज़िन्दगी भर के पापों से मुक्ति देता है. बहुत पवित्र मानते हैं. बनारस जैसे यहाँ भी बहुत सारे घाट हैं और नहाने के लिए अच्छी व्यवस्था भी. लगता है कि यहाँ सर मुंड़ाने का रिवाज़ भी है.

हम लोगोंने भी बरफ की तरह उस ठन्डे पानी में डुबकी लगायी. झील तो मंदिरों से घिरा है लेकिन यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण मंदिर ब्रह्मा जी का है. इंडिया में यह अकेला भ्रह्मा का मंदिर बताते  हैं जहाँ रेगुलर पूजा होती है.  इसके बाद लोगों के बताये रस्ते से मंदिर के लिए निकल पड़े. रास्ते में फूलों की माला खरीदी और मंदिर पहुँच कर ब्रह्मा जी के दर्शन किये.

भ्रह्मा जी से निपटकर वहां की छोटी छोटी दूकानों से छुटपुट खरीददारी की. सबको भूक सता रही थी और कहीं ढंग का होटल नहीं दिख रहा था.  सड़क के किनारे एक जगह खाना परोसा जा रहा था. हम सब ने वहीँ खा लेने की सोची और बेंच पर बैठ गए. सबसे कम दर ५० रुपये थाली थी और वह भी लिमिटेड खाना. हमारी मजबूरी थी. खाने के बाद बस अड्डे पहुंचे और वहां से बस भी मिल गयी. इस बार किराया केवल ७ रुपये प्रति व्यक्ति पड़ा था जब कि अजमेर से आते समय हम से ३० रुपये येंठे गए. लेकिन बस वोल्वो जैसी थी बगैर ए.सी. बस ने हमें बस अड्डे पर उतार दिया और फिर वहां से एक टेम्पो में बैठ कर सब वापस अपने होटल पहुंचे. ५.३० बजे शाम फिर बाहर निकलना हुआ. गरीब नवाज़ का प्रसिद्द मज़ार हमारे होटल के पास ही था. सबने सोचा वहां जाकर भी हम बेरोजगारों की डिमांड रखते हैं. हो सकता है हम सब की झोली भी भर जाए. इलाहाबाद के पंडों की तरह वहां भी लूट खसोट दिखी. हमारे एक दोस्त से तो वहां १०० रुपये झटक लिए. खैर अपना पेटीशन देकर लौट आये. रास्ते में एक ठेले में गोलगप्पे मिल रहे थे. ६ रुपये के दस. सब ने हल्ला किया, ज्यादा क्यों ले रहे हैं. ५ की दस दो. ठेले वाला मान गया. गोलगप्पे स्वादिष्ट थे ऊपर से उसने सबको दही पुड़ी बनाकर खिलाई. उसके पैसे नहीं लिए.

इसके बाद हम लोगोंने मार्केट घूमलिया और कुछ कुछ घरवालों के लिए खरीद भी लिया.  अजमेर में एक ख़ास बात देखने में आई. सभी दूकान ९ बजे रात तक बंद हो जाते थे. अब हमें रात के खाने की फिकर हुई. फिर ढूँढ़ते रहे. एक होटल दिखी “रसना रेस्टोरेंट” वहीँ चले गए. रेट पूछा तो ८० रुपये थाली था.  सबने डटके खाया क्योंकि हर चीज बड़ी लाजवाब बनी थी. खाकर वापस अपने होटल पहुंचे और एक दो घंटे कुछ किताबें पलट कर सोने चले गए.

दुसरे दिन सुबह सुबह ही उठना पड़ा था. इतवार का वो दिन बड़ा हेक्टिक रहा. ब्रेकफास्ट निपटाकर अपने अपने सेण्टर टेम्पो में बैठ पहुँच गए. आदर्शनगर के मेरे सेण्टर में हमारे साथियों से केवल एक ही था. औरों के सेण्टर अलग अलग थे.

परीक्षा १२ बजे के लगभग ख़त्म हुई. हम सब रेलवे स्टेशन में इकट्ठे हुए. जब हम लोग शनिवार की सुबह स्टेशन से बहार निकले थे तो उतना ध्यान नहीं दिया था लेकिन इतवार शाम स्टेशन को जब देखा तो बड़ा आलीशान लगा. वहां एक कचौड़ियों की दूकान थी. वह! क्या गजब के थे. बड़े बड़े, ऊपर से दाल डाल कर बनाकर दिया था.  एक से ही पेट भर गया. हम लोगों की वापासी गाडी रात ९ बजे थी सो टेम्पो में बैठ कर १० किलोमीटर दूर बजरंग

गढ़ चले गए. वहां एक झील “अन्सागर” था जो बहुत सुन्दर लगी. पार्क भी बने थे. ऊपर पहाड़ी पर बजरंगबली का मंदिर था. सोचा मेहनत कर चढ़ लेते हैं. थोडा और पुण्य मिल सकता है. थकान मिटाने शाम होते होते अपने होटल वापस आ गए. मैं तो एक घंटे सो ही गया. देर शाम एक बार फिर शौपिंग की गयी और अंत में अपना बोरिया बिस्तर लेकर स्टेशन आ गए. वहीँ बाहर ४० रुपये थाली वाला खाना भी खा  लिया. ट्रेन का आने का समय हो चुका था लेकिन बार बार प्लेटफोर्म बदलने की सूचना  दी जा रही थी. आखिरकार ट्रेन आई और हम सब चढ़ गए. दूसरे  दिन सुबह ११.३० को वापस भोपाल.

देखने के लिए तो अजमेर ही बहुत कुछ था. पुराने जमाने के बिल्डिंग वगैरह लेकिन टाइम कम था और उतनी जानकारी भी नहीं थी. नवम्बर में गए होते तो दुनिया के सबसे बड़े ऊंटों के मेले को भी देख पाते. बोलते हैं वहां बहुत सारे फोरेनेर्स भी आते हैं.

पुष्कर के पवित्र झील में डुबकी, ब्रह्मा के दर्शन, गरीब नवाज़ के दरगाह में मन्नत और अंत में बजरंगबली के दर्शन हमलोगों की कमाई रही.

नोट: २/३ चित्र विकी मीडिया कामंस  से जुगाड़ा है बाकी मेरे मोबाइल से लिए गए है. मेमोरी ख़त्म हो गयी थी.

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राजस्थान का बिश्नोई समाज

अक्टूबर 19, 2010

हम अपने आपको पर्यावरण के लिए समर्पित  होने का स्वांग रचते रहे. ख़ास  कर जब हम अपने मित्रों  के साथ  पिकनिक में जाया करते . वहां दूसरों द्वारा फैलाये हुए कचरे को इकठ्ठा कर उठा लाते. यह मेरी आदत नहीं थी, लगता है एक मजबूरी रही जिससे लोग मुझे पर्यावरण प्रेमी के रूप  में जानें. अपने आप को इस तरह पर्यावरण के लिए संवेदनशील होने का भ्रम पाल रखा है.

पर्यावरण के लिए सजग और प्रकृति से घनिष्ट राजस्थान के  बिश्नोई समाज के बारे में कुछ लिखने की चाहत एक अरसे से रही है परन्तु आज ऐसा कुछ हुआ कि लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ी. यहाँ मैं उल्लेख करना चाहूँगा श्री राहुल सिंह के सिंहावलोकन में उनकी ताजा प्रविष्टि  “फ़िल्मी पटना” का जहाँ उनके शब्दों के जादू से ही सिनेमास्कोप बन गया है. चित्रों की  आवश्यकता ही नहीं है. शब्द अपने आप में सक्षम हैं इस बात से कोई विरोध नहीं है परन्तु चित्र भी उतने ही सक्षम होते हैं.

यह चित्र श्री विजय बेदी के द्वारा काफी मशक्कत के बाद लिया गया है और श्री गौरव घोष जी के टिपण्णी से सहमति जताने के बाद के खोज बीन में यहाँ उपलब्ध हुआ था: http://sixteenbynine.co/thousand-words-in-snap

एक और चित्र गूगल बाबा की मेहरबानी से मिला जिसे श्री हिमांशु व्यास ने लिया है. हिन्दुस्थान टाइम्स में वे छायाकार हैं.

रतन सिंह शेखावत  जी के द्वारा प्रेषित मेल में निहित  सुझाव का सम्मान करते हुए एक वीडिओ भी प्रस्तुत है: