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छेद वाला दुकान

जुलाई 1, 2013

कुछ आवासीय परिसरों में ठेले में घरेलू आवश्यकताओं की वस्तुयें विक्रय हेतु आती रहती हैं. बहुत सारी गृहणियां अपने दैनिक उपयोग हेतु सब्जी भाजी आदि खरीदती ही हैं भले दाम कुछ अधिक हो. बाज़ार जाने से तो बचे. कुछ परिसर ऐसे भी हैं जहाँ ठेले वालों को छुट्टी के दिन भी फटकने नहीं दिया जाता.  कुछ ऐसे ही एक परिसर में जो दिखा उसे साझा करने की सोची.

यह परिसर बहुत विशाल है. कुल  760  मकान बने हैं . एक छोर से दूस्र्रे छोर की दूरी लगभग 2 किलोमीटर है.  एक छोटी सी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है जहाँ एक डॉक्टर की क्लिनिक, एक जनरल   स्टोर आदि हुआ करती थी . जनरल स्टोर वाला सब्जी आदि भी रखा करता था परन्तु अनाप शनाप दर पर विक्रय करता था.  शनै शनै लोगों ने उसके यहाँ से माल खरीदना बंद कर दिया और दुकान बंद हो गयी.  सहकारी समिति का दुग्ध वितरण केन्द्र की गुमटी अभी अभी खुली है  जहाँ दूध, दही, घी डबल रोटी आदि उचित मूल्य पर उपलब्ध है.  दैनिक उपभोग की दूसरी वस्तुओं के लिए अब बाहर ही जाना होगा जो परिसर के बाहर के मुख्य मार्ग पर उपलब्ध नहीं है. वहां से कमसे कम एक किलोमीटर और जाना पड़ता है.

परिसर के दाहिनी तरफ एक  मध्यम वर्ग की बस्ती है परन्तु पास होते हुए भी बहुत दूर है क्योंकि परिसर के सामने के मुख्य मार्ग से भी कोई रास्ता नहीं बना है. लम्बी दूरी का घुमावदार  रास्ता है. परिसर के रहवासियों के पास या तो अपने स्वयं के कार आदि हैं या फिर सरकारी वाहन उपलब्ध है परन्तु पतियों के साथ वाहन दफ्तर जाया करते हैं. गृहणियों के लिए छुट्टियों के दिन ही वाहन सुख मिल पाता है. परिसर के दाहिनी तरफ के चारदीवारी से लगी हुई वह बस्ती है  परन्तु उसपार जाने में दीवार बाधक है.  उस पार के दूकान और घर भी दीवार से सटकर बने हैं.

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चार दीवारी से सटे हुए उसपार के एक दूकानदार ने एक नायाब तरीका ढून्ढ निकाला.  उसके दूकान के पीछे उसका आवास भी है.  उसके घर के बगल की गलीनुमा बरामदे से परिसर की तरफ एक छेद  बना दिया और इस प्रकार बनी खुली खिड़की में एक घंटी का बटन लटका दिया.  परिसर वासियों को कुछ लेना हो तो बटन दबा देते हैं जिससे दूकान में घंटी बजती है और खिड़की के उसपार एक महिला उपस्थित हो जाती है, बोल मेरे आका की तर्ज पर. इस व्यवस्था में रहवासियों को जो दूकान पे नहीं हो वह भी उपलब्ध होता है. दूकानदार आस पड़ोस की दूसरी दूकानों से खरीद लाता है.  हाँ वह एक दो रुपये अधिक ले लेता है  जिसकी परवाह किसी को नहीं होती.

सामान देते हुए हमने उस महिला की तस्वीर लेनी चाही परन्तु  वह बडी चालाक निकली. केमरा देखते ही नीचे बैठ गयी.

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गर्मियों की छुट्टी में दूकानदार अपने गाँव चला गया और खिड़की बंद हो गई.  कोलोनी के लोग परेशान होने लगे तब एक नई जानकारी मिली कि कोलोनी में काम वाली बाईयां बगल वाली बस्ती से ही आती हैं और वे अक्सर दीवार फांद (चढ) कर आया जाया करती हैं.  अब  कोलोनी की महिलायें ने भी कुछ यही तरीका अपनाया. एक दिन देखा तो दीवार ही टूटी मिली जिसके कारण कोई  भी ऐरा ग़ैरा  अन्दर प्रवेश कर सकता है. गनीमत है कि उस पार किसी सज्जन ने तोड़े गए दीवार से सटाकर लकड़ी जमा दी है जिस के कारण उस छेद  का प्रयोग बाधित हो गया है.  यहाँ का  विकास प्राधिकरण चाहे तो उस जगह एक गेट बना सकता है  जिससे नजदीक के बस्ती से कोलोनी का संपर्क बन जाए.

तदबीर से तक़दीर नहीं बदली जा सकी

अप्रैल 10, 2013

केरल में शिक्षा का स्तर चाहे जो भी हो, फलित ज्योतिष में विश्वास करने वालों की एक बड़ी संख्या है.  एर्नाकुलम से लगभग 33 किलोमीटर दूर् नदी किनारे एक गाँव है पज़्हूर. यहाँ एक पारंपरिक ज्योतिषी का निवास है और यहाँ कही गयी बातें या भविष्यवाणियाँ अपनी विश्वसनीयता के लिए सदियों से प्रख्यात है. जो कह  दी गयी वह् अन्तिम होती है. यही घर पज़्हूर पडिपुरा के नाम से प्रख्यात है.

krishnapuram-palace-padipuraपडिपुरा का एक नमूना – अंतर्जाल से 

केरल के घरों में मुखय भवन से प्रवेश द्वार 100/200 फीट की दूरी पर होता है और प्रवेश द्वार के साथ ही एक छोटा मंडप और एक दो कमरे बने होते हैं जहाँ अचानक आ पहुँचे आगन्तुकों को रात्रि विश्राम के लिए पनाह मिल जाती है.इस प्रकार के प्रवेश द्वार (ड्योढ़ी) को ही  पडिपुरा कहते हैं. जब उस इलाके में भ्रमण कर रहे थे तो कौतुहल वश यहाँ भी हो आए थे. हम जिस दिन वहाँ पहुँचे उस दिन परामर्श उपलब्ध नहीं था और हमें भी इस में कोई रूचि नहीं थी. वहाँ एक बुजुर्ग दिखे जिन्होंने उनके मूल घर के अन्दरूनी भाग को बड़े चाव से दिखाया. पुराना हिस्सा जर्जर था परन्तु बाज़ू में ही एक नया निर्माण भी था.

???????????????????????????????ज्योतिष विद्या द्वारा जीविका चलाने वालों को कनियन ( गुनिया) कहते हैं और जाति प्रथा के अंतर्गत निम्न वर्ग में आते हैं. अधिकतर निम्न वर्ग के लोग ही इनसे परामर्श लेने जाते हैं परन्तु पज़्हूर पडिपुरा ने काफ़ी ख्याति अर्जित कर ली है अतः उनसे परामर्श लेने सभी जाते हैं. चबूतरे में कुछ कौड़ियों को गिराया जाता है और उनका अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुँचते हैं. जन्म कुंडली से इनका कोई लेना देना नहीं रहता अलबत्ता प्रक्रिया शुरू करने के पूर्व कुछ अनुष्ठान होता है.??????????????????????????????? जहाँ तक मुझे याद है आजकल वहाँ 18 वीं पीढ़ी चल रही है. पडिपुरा के बगल में एक लंबा चबूतरा है जहाँ उनके पूर्वजों के कतारबद्ध स्मृति चिन्ह बने हैं. जिस बुजुर्ग से हमने बात की वह् वर्तमान गुनिया का पिता है और वह् एक आयुर्वेदिक वैद्य है. उसे गुनिया वाली विद्या नहीं आती.  कुछ पूर्व तक केरल में इन लोगों के बीच मातृ सत्तात्मक परिवार व्यवस्था रही है और विरासत में विद्या भी भांजे को ही मिलती है.

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इस पडिपुरा से जुड़ी एक मिथक है जो काफ़ी रोचक है. एक नम्बूदिरि ज्योतिषाचार्य  हुआ करता था . नाम था थलकुलथूर भट्टतिरि. एक बार उसने अपनी ही कुंडली बांची और पता चला कि  उसका किसी शूद्र महिला से संसर्ग होगा जिस कारण वह्  भ्रष्ट घोषित होगा. गणना कर उसने वह् तारीख भी ज्ञात कर ली जिस दिन यह सब कुछ होने वाला था. वह् अपने नियति को नियंत्रित करने और  संभावित अपमान से बचने के लिए पज़्हूर की तरफ़ निकल पड़ा. कुछ दोस्तों को भी साथ ले लिया. वहाँ के नदी में एक लंबी नौका पर सवार हो गए और रात भर नदी में  नौका विहार का कार्यक्रम बना लिया. परन्तु नियति के आगे तो घुटने टेकने ही पड़ते हैं .रात 12 बजे के लगभग काले काले बादल घिर आए. जोरदार गर्जन के साथ ही मूसलादार  बारिश हुई और नाव भी पलट गयीं.

भट्टतिरि तैर कर किनारे आ गया लेकिन सूझ नहीं रहा था कि आगे क्या करें. उसे एक सड़क दिखी और चलने लगा. आगे जाकर एक दिए की रोशनी दिखी तो उसने अपना रुख उधर कर लिया. कुछ ही देर में एक घर के पडिपुरा मॆं पहुँच गया जहाँ दिया जल रहा था. एक खाट बिछी थी और ओढ़ने का भी इंतजाम था. वह् तो एकदम थक कर चूर चूर हो चला था अतः बग़ैर गृह स्वामी को बताये ही लेट गया. थोड़े देर में नींद भी आ गयीं.

यह घर वहाँ के पारंपरिक गुनिये का ही था जो उस दिन बाहर जाकर मदिरापान कर आया था जिस वजह से पत्नी ने खरी खोटी सुनायी थी. पति रुष्ट होकर चला गया था परन्तु पत्नी उसके वापसी की राह् देख् रही थी. पडिपुरा मॆं भट्टतिरि तो सो रहा था परन्तु दिए में तेल खत्म हो जाने से वह् बुझ गयीं थी. ग्रिह्स्वमिनि तो इंतज़ार कर ही रही थी और जब उसने देखा कि पडिपुरा से रोशनी नहीं आ रही है, वह् स्व्यं चली आयी और खाट पर सोये हुए व्यक्ति को अपना पति समझते हुए बगल में लेट गयीं. भट्टतिरि भले नींद में रहा हो उसे गर्मी महसूस हुई और वह उस स्थ्री के पास सरक आया.  जिस बात से बचने के लिए इतने सारे उपक्रम किए थे सब धरे के धरे रह गए. क्रीडा समाप्ति के बाद भट्टतिरि उठ बैठा और पूछा तुम कौन हो. गृहस्वामिनी भी डरी हुई थी. उसके भी समझ में आ ही गया कि गलती हो गयीं. ऊसने अपना परिचय दिया और क्षमा याचना की. भट्टतिरि भी स्थितियों से समझौता करते हुए  उस स्थ्री को बताया कि उसे एक विलक्षण प्रतिभा वाला पुत्र प्राप्त होगा. आत्म ग्लानि से भरा हुआ वह् वहाँ से तीर्थाटन  के लिए निकल पडा.

कालांतर में उस महिला (कनियात्ति) को  भट्टतिरि के संतान के रुप में एक पुत्र की प्रप्ति होती है जो बड़ा होकर काफ़ी ख्याति प्राप्त करता है. उससे परामर्श कर सलाह लेने दूर् दूर् से बड़े बड़े लोग आने लगे. निकट के गाँव में एक ब्राह्मण था. उसकी सभी कन्या संतानें थीं. इस बार पुनः उसकी पत्नी गर्भवती हुई थी. वह् जानना चाह रहा था कि क्या अब पुत्र प्रप्ति का योग बन रहा है. हमारा गुणी गुनिया उस ब्राह्मण के घर जाता है जहाँ एक सन्यासी से मुलाकात होती है जो दो दिन से उनके यहाँ ठैरा हुआ था. सलाम दुआ के बाद गुनिया कुछ अनुष्ठान करता है और काफ़ी चिंतन के बाद घोषणा करता है कि इस बार भी लड़की ही जन्म लेगी. यह सब वहाँ उपस्थित सन्यासी देख् सुन रहा था. उसने कहा मुझे भी ज्योतिष का थोड़ा ज्ञान है और पूरी सम्भावना लड़के की ही बन रही है. वह् प्रसव होने तक उसी घर में बने रहने कि इच्छा जाहिर करता है जिसे ब्राह्मण मान लेता है. हमारे गुनिया यह कह कर की उसी की बात सच निकलेगी, भुन भुनाते हुए अपने घर लौट आता है.

छै महीने बाद ही ब्राह्मण के घर प्रसव होने जा रहा है. उनके घर की गाय भी उसी दिन जनने वाली है. हमारा गुनिया भी ख़बर पकड़ पहुँच जाता है. जब गाय रम्भाने  लगती है तब गुनिया कहता है कि बछडे के माथे पर सफेद धब्बा होगा. सन्यासी जो वहीं उपस्थित था असहमति जाहिर करते हुए कहता है कि माथे पर कोई धब्बा नहीं होगा बल्कि पूंछ के बाल सफेद होंगे. ब्राह्मण कि पत्नी का प्रसव भी हो जाता है और सन्यासी के कहे अनुसार इस बार एक बालक जन्म लेता है. वहीं बछड़े के पुंछ के बाल सफेद निकल आते हैं और माथे पर कोई धब्बा नहीं रहता. इस तरह गुनिया की दोनोँ भविष्यवाणियाँ ग़लत साबित होती हैं. गुनिया सोच में पड़ जाता है और समझ जाता है कि सन्यासी कोई असाधारण व्यक्तितव है. उसे शंका होती है कि कहीं वह् उसका पिता तो नहीं है.और हिम्मत जुटाकर पूछ बैठता है. सन्यासी अपने आप को भट्टतिरि होने की पुष्टि करता है.

पिता पुत्र गले मिलते हैं. पुत्र के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, भट्टतिरि उसके घर जाने के लिए राजी हो जाता है और दोनों निकल पड़ते हैं. रास्ते में भट्टतिरि अपनेपुत्र को उसके विफल होने के कारणों से अवगत करता है. गर्भस्त शिशु के लिंग के बारे में गर्भावस्था के तीन माह पूर्व पूर्वानुमान उचित नहीं था. बछड़े के माथे में धब्बे के बारे में भी बताया कि वास्तव में उसकी पूँछ माथे में चिपकी हुई थी जिस कारण अनुमान ग़लत साबित हुआ. बतियाते बतियाते घर पहुँच गए. गृह स्वमिनी ने यथोचित्‌ सत्कार  किया. दो दिन बाद भट्टतिरि वहां से लौट आने का उपक्रम करता है परन्तु मान मनौवल के पश्चात वहीं रुक जाने के लिए सहमत भी हो जाता है. कुछ माह पश्चात भट्टतिरि का अन्तिम समय आ जाता है तब वह् अपने पुत्र और ग्रिह्स्वमिनी को बुलाकर हिदायत देता है कि उसके मरणोपरांत दाह संस्कार करने की जगह उसके शरीर को वहीं उस पडिपुरा में दफना कर चबूतरा बना दिया जावे. यह भी बताया कि उस चबूतरे में बैठकर विधिपूर्वक की गयी सभी भविष्यवाणियाँ सदैव सही निकलेंगी क्योंकि भट्टतिरि की आत्मा वहाँ उपस्थित रहेगी.

इन हिदायतों केदिए जाने के पश्चात शीघ्र ही भट्टतिरि प्राण त्याग देता है. उसकी अन्तिम इच्छा का पालन किया जाता है.

वहाँ के गुनिया परिवार का विश्वास है कि वहाँ के पडिपुरा मॆं भट्टतिरि की आत्मा ही बोलती है.