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पन्हाला (कोल्हापुर) कभी मराठों की राजधानी थी

फ़रवरी 9, 2009

teen-darwajaहम मुंबई प्रवास पर थे. हमारी सहधर्मिणी का मैका जो ठैरा. उसे पैरों में गठियावात  के कारण तकलीफ रहा करती थी. परन्तु किसी नई जगह या फ़िर मन्दिर आदि जाने की बात की जावे तो पूरा दर्द काफूर हो जाया करता. यही हुआ जब उसके भाई ने असली महालक्ष्मी मन्दिर जाने की बात कही. टिकटों का इंतज़ाम किया गया और दोनों परिवार निकल पड़े महालक्ष्मी एक्सप्रेस से महालक्ष्मी को देखने कोल्हापुर. गाड़ी शाम को छूटती है और सुबह सुबह छत्रपति शाहूजी महाराज टर्मिनस (यही नाम है कोल्हापुर के स्टेशन का) पहुँच जाते हैं. नजदीक के ही एक होटल में कमरे लेकर स्नान पान से निवृत्त हो तैयार हो जाते हैं. हमें बताया गया था की २० किलोमीटर की दूरी पर पन्हाला नाम का  एक किला भी है और समुद्र सतह से ३१७७ फीट की ऊंचाई के कारण वहां का हिल स्टेशन भी कहलाता है. प्रातःकालीन दर्शन का वक्त गुजर चुका था. अब क्योंकि मन्दिर जाने का कोई औचित्य नहीं था इसलिए एक टैक्सी लेकर पन्हाला देख आने का कार्यक्रम बनाया गया.

panhala-fort-kolhapurदक्खन के बड़े किलों में से एक पन्हाला  भी है जिसका निर्माण शिल्हर शासक भोज II द्वारा सन ११७८ से १२०९ के बीच सहयाद्री पर्वत श्रंखला से जुड़े ऊंचे भूभाग पर करवाया  गया था. इस किले का आकार कुछ त्रिकोण सा है और चारों  तरफ़ के परकोटे की लम्बाई लगभग ७.२५ किलीमीटर बताई जाती है.

यह किला कई राज वंशों के आधीन रह चुका है. यादवों, बहमनी, आदिलशाही आदि के हाथों से होते होते सन १६७३ में शिवाजी के कब्जे में आ गया. वैसे शिवाजी इस किले पर सन १६५९ से ही लगातार आक्रमण करता रहा है. शिवाजी ने इस किले को अपना मुख्यालय बना लिया था. हलाकि शिवाजी पूरे वक्त किसी न किसी सैनिक अभियान में लगे रहे लेकिन यही वह जगह है जहाँ उन्होंने ने सबसे अधिक समय बिताया था. सन १६८९ से दो बार यह किला औरंगजेब के कब्जे में भी चला गया था लेकिन हर बार मराठे उसे वापस लेने में सफल रहे.

panhala-3729_4किले के पहुँच मार्ग में ही तालाब के सामने हरे और सफ़ेद रंग से पुती एक दरगाह है जिसके थोड़ा आगे जाकर तीन दरवाज़े से प्रवेश करते हैं. किले के अन्दर एक कोठी हमें दिखाई गई (जो इब्राहीम आदिलशाह द्वारा सन १५०० में निर्मित सज्जा कोठी कहलाती है) जहाँ शिवाजी के ज्येष्ठ चिरंजीव संभाजी को पिता द्वारा ही  कैद कर रखा गया था. शिवाजी संभाजी की उद्दंडता, ऐय्याशी आदि के कारण परेशान हो गया था. इसी किले में शिवाजी को सिद्दी जोहर की सेना ने ४ महीने तक घेरे रखा और अंततः एक बारिश की रात शिवाजी वहां से निकल भागा जब की उसका स्वामिभक्त सेनापति बाजी प्रभु देशपांडे ने दुश्मनों को पवनखिंड में  रोके रखा और अंततः अपने प्राणों की आहुति दी.  किले के अन्दर ही अन्न भण्डारण (अम्बरखाना) एवं जल संग्रहण की बड़ी ही उत्तम व्यवस्था की गई है. कुछ दीवारों/दरवाजों में हमने देखा कि पत्थरों की जोड़ जहाँ होती है वहा शीशा भरा गया है. इसके वैज्ञानिक  पक्ष के बारे में हम अनभिग्य हैं. ऊपर किले से नीचे और चारों  तरफ़ का नैसर्गिक सौन्दर्य मनमोहक है.

panhalafort3किले से बाहर निकलकर वापस कोल्हापुर की ओर बढ़ चले. तभी एक अच्छा सा ढाबा दिखा जहाँ हम लोगों ने दुपहर का खाना खाया. भोजन में ३ या चार प्रकार की सब्जियां थी. अंकुरित दालों की एक कटोरी भी दी गई जिसे ऊसल कहते हैं. कुल मिला कर खाना अच्छा लगा और बड़े ही सस्ते में निपट गए.

 इस प्रविष्टि के बाद हम कोल्हापुर चलेंगे. लेकिन इस बीच एक पोस्ट युवाओं के लिए भी.

 
 
 
 

 

आतंक के विरुद्ध

दिसम्बर 4, 2008

atankavadatankavad1atankavad22प्रवीण त्रिवेदी जी के ब्लॉग से प्रेरित

मित्रों से आग्रह है की वे भी अपने अपने ब्लोगों पर शपथ युक्त इस संदेश को स्थान दें