टिन्डिस (Tyndis) जिसे पोन्नानि कहते हैं

जून 26, 2014

रोमन साम्राज्य के अभिलेखों में भारत के दक्षिणी तट के टिन्डिस (Tyndis) नामक बंदरगाह का उल्लेख मिलता है और आज के “पोन्नानि” को ही इतिहासकारों ने टिन्डिस होने की सम्भावना व्यक्त की है तो फिर  एक बार देख आने के लिए मन बन ही गया.  अच्छे से याद है बचपन में हम सब को यह  कह कर डराया जाता था कि बेटा पोन्नानि गए तो सुन्नत कर देंगे और टोपी पहना कर वापस भेज देंगे. एक और बात नें भी हमें उकसाया था. समुद्र में उस जगह केरल की सबसे बड़ी नदी “भारतपुज़्हा” आ मिलती है और साथ ही “तिरूर” नदी भी.  गर्मियों में वहां अप्रवासी पक्षियों का डेरा रहता है लेकिन हमारे जाते तक वे फुर्र हो चुकी थीं.

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हम लोग घर से तो समय रहते निकले थे लेकिन रास्ते में कुछ और महत्वपूर्ण स्थलों में रुकने के कारण शाम पौने पांच तक ही  पोन्नानि पहुँच पाये. वहां पहुँचते ही पाया कि बायीं तरफ का रास्ता नए पोन्नानि की तरफ जा रहा था जबकि सीधे जाने पर पुरानी बस्ती पड़ती थी. हमें तो पुराने से मतलब था सो सीधे चल पड़े.  रास्ता सकरा था लेकिन दोनों तरफ की छोटी छोटी दुकानों को देख अंदाज़ा हो गया कि बस्ती का वह हिस्सा ज़माने से चले आ रहे व्यवसाय का केंद्र है. जल मार्ग से बस्ती में सामान आदि लाने के लिए प्रयुक्त पुराने नहर भी दिखे.  पीछे बैठा भतीजा GPS की सहायता ले मार्ग दर्शन दे रहा था इसलिए कहीं कुछ पूछने की जरूरत नहीं पड़ी. हम लोग सीधे समुद्र तट पर पहुँच गए. 

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पोन्नानि वैसे है तो बंदरगाह लेकिन अब यह मत्स्य आखेट के लिए प्रख्यात हो चला है (Fishing Harbour). एक तरफ कुछ नावें खड़ी थीं लेकिन जैसा चित्रों में देखा था वैसा जमावड़ा नहीं था. अधिकतर सभी नावें आखेट के बाद लौटने को थीं.   हम लोगों ने समुद्र तट और संगम का आनंद उठाया. संगम स्थल पर  अनेकों डॉलफिंस को समूह नृत्य करते देख बच्चे रोमांचित हुए.

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IMG_5688इन्हें उस पार जाना है – नाव की प्रतीक्षा

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IMG_5689यह स्टार फिश चट्टान पर मरा पड़ा था

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वैसे पोन्नानी में देखने समझने के लिए बहुत कुछ है लेकिन समयाभाव के कारण वहां के ख्याति प्राप्त जुमा मस्जिद की तरफ चल पड़े. रास्ते में  छोटी सी एक चाय की दूकान में अपनी तलब दूर की. जुमा मस्ज़िद  के बारे में चाय वाला कुछ बता नहीं पाया क्योंकि पोन्नानि में 50 के लगभग मस्जिद हैं.  एक बुजुर्ग से सबसे पुराने मस्जिद के बारे में पूछने पर उसने रास्ता बता दिया. कुछ छोटी गलियों के अंदर से (रिहाइशी) गुजरने पर मानस पटल में बसी मस्जिद की इमारत दिखने लगी.  मस्जिद के सामने केरल की पारम्परिक तालाब दिखी जिसके किनारे बैठने के लिए सीमेंट की बेंचें बनी थी और कई लोग वहां बैठे गपियाते दिखे.  उस मुहल्ले के लोगों का छोटा सा मरीन ड्राइव.

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हम लोगों ने बाहर बैठे सज्जनों से इस बात की पुष्टि कर ली थी कि  अंदर प्रवेश करना वर्जित अथवा नियंत्रित तो नहीं है.  यह मस्जिद  हिज़री संवत 925 (सन 1547) में निर्मित हुई थी और जैनुद्दीन मखदूम (प्रथम) को इसका श्रेय दिया जाता है. इसी व्यक्ति के पोते जैनुद्दीन मखदूम (द्वितीय) नें केरल के इतिहास पर “तुहफतुल मुजाहिदीन” नामक ग्रन्थ की रचना की थी. मस्जिद के  इमारत की बनावट उत्कृष्ट पर विशुद्ध स्थानीय है जिसे “नालु केट्टु” कहते हैं. यदि बगल में इस्लामी शैली की छोटी दूसरी इमारत नहीं होती तो पहचान पाना मुश्किल होता.  अंदर जाने पर ही पता चला कि हम लोगों ने पिछवाड़े से प्रवेश किया था जहाँ ऊंची क्यारियों में एक ही आकार के पत्थरों का जमावड़ा था.  वे इतने नजदीक गड़े थे कि उन्हें कब्र मानने में तकलीफ हो रही है.IMG_5699

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पोन्नानी  मजहबी शिक्षा का ख्याति प्राप्त केंद्र है और यहाँ कई विदेशी छात्र अध्ययनरत हैं.पोन्नानी को अल अज़हर महाविद्यालय माना जाता रहा है. इस्लाम के सम्मानित धर्म प्रचारक मलिक-इब्न-दिनार ने पोन्नानी आकर बहुत सारे लोगों को प्रभावित कर धर्मान्तरित किया था. वैसे शहर की कम से कम आधी आबादी मुसलमानों की होगी परन्तु धार्मिक सद्भावनाएँ कुंठित नहीं हो पाई.

Kari Rocks Ponnani

पोन्नानी में जो हम देख  नहीं पाये उनमें एक तो “बीयम” झील है जिसमे नौका दौड़ होती है. इस दौड़ में स्त्रियां भी शामिल होती हैं.  पर्यटन के दृष्टिकोण से  झील में जल क्रीड़ा के विभिन्न साधन उपलब्ध किये गए हैं..  एक काले पत्थर की पहाड़ी  है जो अपने अनोखेपन के लिए प्रसिद्द है. इसकी चुराई हुई तस्वीर ऊपर दे रखी है.

  

 

गंगा इमली Camachile (Pithecellobium dulce)

मई 27, 2014

Ganga ImlI

अभी कुछ दिनों पूर्व फेसबुक पर बागवानी की शौकीन एक महिला ने एक चित्र  डाला था और उस फल के बीज उपलब्ध कराने की पेशकश की थी.  फोटो को देख मैं उछल पड़ा क्योंकि एक तो बचपन की ढेर सारी यादें इसके साथ जुडी थीं और इस फल को दशाब्दियों से नहीं देखा था. जब कभी भी याद आई तो दोस्तों को या बच्चों को बताने की कोशिश की थी लेकिन समझा नहीं सका था. मैंने तो सोचा था कि इसके पेड लुप्त हो गए हैं.

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बात गंगा इमली की ही है. हम लोग अंग्रेजी इमली कहते थे. एक पाकिस्तानी फेसबुकिया ने इसका नाम जंगल जलेबी बताया. बचपन में गर्मियों की  भरी दुपहरी में दोस्तों के साथ गुलेल, डंडे आदि से लैस होकर शहर के बाहरी तरफ जाया करते थे जहाँ काफ़ी पेड थे. पेड बहुत बड़े थे और कटीले भी. इस कारण  ऊपर चढ़ने में परेशानी होती थी. डंडों  से शाखाओं को प्रहार कर गिराते थे और अपनी  अपनी  जेबों में ठूंस ठूंस कर भर लाते थे. उन्हीं पेड़ों के आगे एक बार बढ चले थे, एक पहाडी के तले जहाँ खजूर के पेड के पोले  तने में एक लाश रखी देख भाग आये थे. घर आते ही बुखार चढ आया था.  जेब से गंगा इमलियों की बरामदगी मेरी जम कर धुनाई का कारण बनी.

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आज पुनः एक बार फोटो में गंगा इमली देख कर मन प्रसन्न हो गया  बचपन में तो ज्ञान नहीं था. लेकिन अब मालूम हुआ कि यह फल मूलतः मेक्सिको का है और दक्षिण पूर्व एशिया में बहुतायत से पाया जाता है. फिलिप्पीन में न केवल इसे कच्चा ही खाया जाता है बल्कि  चौके में भी कई प्रकार के व्यजन बनाने में प्रयुक्त होता है.

इस फल में प्रोटीन, वसा, कार्बोहैड्रेट, केल्शियम, फास्फोरस, लौह, थायामिन, रिबोफ्लेविन आदि तत्व भरपूर मात्र में पाए जाते हैं. इसके पेड की छाल  के काढे से पेचिश का इलाज किया जाता है.  त्वचा रोगों, मधुमेह और आँख के जलन में भी इसका इस्तेमाल होता है. पत्तियों का रस दर्द निवारक का काम भी करती है और यौन संचारित रोगों में भी कारगर है . इसके पेड की लकड़ी का उपयोग इमारती लकड़ी की तरह ही किया जा सकता है.

यदि आपके गाँव / शहर में हो तो बताएं.


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