नालसोपारा (मुंबई), एक प्राचीन बंदरगाह और बौद्ध स्तूप

November 2, 2009 by पा.ना. सुब्रमणियन

हमने पिछली पोस्ट में बताया था कि मुंबई प्रवास में कुछ आस पास की जगहों को देखने गए थे. वज्रेश्वरी के गरम पानी के कुन्ड भी उनमे एक थे. वहां से लौटते समय पुनः वीरार आना ही था जहाँ हम ५ बजे शाम ही पहुँच गए. बचे हुए समय का पूर्ण दोहन करने के लिए साल्वे जी ने “नालसोपारा” चलने का प्रस्ताव रखा. (नालसोपारा दादर स्टेशन से वेस्टर्न सबर्बन रेलमार्ग पर लगभग ४८ किलोमीटर दूर अंतिम पड़ाव “वीरार” के पहले पड़ता है). हमने झट हामी भर दी परन्तु पूछा कि वहां क्या है. उन्होंने समुद्र तट की बात की तो हमने एक अलग जगह बताई. वे चकित हुए. उन्हें नहीं मालूम था कि सोपारा गाँव में सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी सदी में निर्मित कोई स्तूप भी है. वे बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि वे स्वयं बौद्ध धर्म के अनुयायी थे. १५-२० मिनट में ही हम लोग पूछते पाछते ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा संरक्षित उस स्मारक तक पहुँच ही गए.

वास्तविकता तो यह है कि “नाल” और “सोपारा” दो अलग अलग गाँव थे. रेलवे लाइन के पूर्व “नाल” है तो पश्चिम में “सोपारा”. अब यह एक बड़ा शहर हो गया है और बहु मंजिले इमारतों की बस्ती बन गयी है. लेकिन जब हम लोग पुराने सोपारा गाँव के करीब पहुंचे तो भूपरिदृश्य एकदम बदला हुआ लगा. चारों तरफ हरियाली थी. बहुत सारे पेड़ थे परन्तु उनमे ताड़ की अधिकता मनमोहक थी. सड़क के एक किनारे सरोवर था Lake opposite stupaतो दूसरी ओर एक टीला. ASI का सूचना फलक भी लगा था. जब हम लोग अन्दर प्रवेश कर रहे थे तो बारिश होने लगी और हमने एक बड़े पेड़ का सहारा लिया. सामने ही वह प्राचीन बौद्ध स्तूप नीले रंग के तिरपाल से ढंका हुआ था. चारों तरफ ईंट और पत्थर लाकर रखे गए थे जिनसे स्तूप के वास्तविक स्वरुप को मूर्त रूप दिया जाने वाला है. सदियों से क्षरण झेलता वह स्तूप अब कहीं संरक्षित हो रहा है, यह जान कर ख़ुशी हुई परन्तु दुःख भी हुआ कि हम उसे उसके वर्त्तमानStupa स्थिति में नहीं देख सके. वहां बुद्ध  और साथ ही किसी बौद्ध भिक्षु की मूर्ती भी थी. हमें बताया गया कि यहाँ से निकली मूर्तियाँ, शिलालेख आदि औरंगाबाद के संग्रहालय में प्रर्दशित हैं. वहां तैनात चौकीदार सेना से सेवानिवृत्त होकर पुनः ASI की सेवा में आया था. रहने वाला तो उत्तर प्रदेश का था परन्तु उसने हमें उस स्तूप के बारे में यथा संभव जानकारी प्रदान की.DSC04308

वर्षों पूर्व क्षेत्र में किये गए उत्खनन से पता चलता है कि सोपारा में बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म स्थलों की बहुलता थी जो प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से अब लुप्त हो चली है. स्वर्गीय डा. भगवानलाल इन्द्रजी ने सन १८९८ में मुंबई के रोयल येशिअटिक सोसाइटी को सोपारा में बौद्ध स्तूप के अतिरिक्त कई हिन्दू मंदिरों के खंडहरों की जानकारी दी थी. डा. भगवानलाल इन्द्रजी के ही शब्दों में:

“That ancient Hindu temples did exist in this part of the country is without doubt, the many fragments found in the villages around testifying to this, but so complete has been their destruction at the hands of the Muhammadans and Portuguese that their very sites have become obliterated. It was then with a great deal of satisfaction that I discovered and unearthed the foundations of a large Hindu temple at Sopara itself.”

कुछ मंदिरों का निर्माण पूर्ण ही नहीं हुआ था. वहां की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ब्रह्माजी के एक विलक्षण आदमकद (६ फीट) मूर्ती की थी और मूर्तिकार इसे भी पूरा नहीं कर पाए थे. मूर्ती का अपूर्ण हिस्सा लगभग एक फीट का नीचे है जो अब सीमेंट से जड़ दिया गया है. क्या वहां ब्रह्मा जी का मंदिर बन रहा था या केवल किसी अन्य मंदिर में अलंकरण के लिए उसे बनाया गया, यह अभी प्रश्न ही बना हुआ है. कुछ मंदिर अधूरे ही क्यों रह गए यह भी अज्ञात है. सोपारा के समुद्र तट पर बंदरगाह को तलाशने की कोई कोशिश की गयी हो यह भी नहीं मालूम. अतः बंदरगाह का वास्तविक स्थल अज्ञात ही है.Creater

जिस प्रकार दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर ईसा पूर्व से ही “मुज़रिस” (कोडूनगल्लूर) विदेश व्यापर के लिए ख्याति प्राप्त बंदरगाह रहा उसी प्रकार उत्तर भारत के पश्चिमी तट पर उसी कालक्रम में सोपारा भी भारत में प्रवेश के लिए एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था. इस बंदरगाह का संपर्क विभिन्न देशों से रहा है. सोपारा को सोपारका, सुर्परका जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता था. प्राचीन अपरानता राज्य की राजधानी होने का भी गौरव सोपारा को प्राप्त है. इस्राइल के राजा सोलोमन के समय से ही बड़ी मात्रा में उनके देश से व्यापार का उल्लेख मिलता है. कदाचित बाइबिल में उल्लेखित भारतीय बंदरगाह “ओफिर” सोपारा ही था. बौद्ध साहित्य “महावंश” में उल्लेख है कि श्रीलंका के प्रथम राजा, विजय ने “सप्पारका” से श्रीलंका के लिए समुद्र मार्ग से प्रस्थान किया था. प्राचीन काल में सोपारा से नानेघाट, नासिक, महेश्वर होते हुए एक व्यापार मार्ग उज्जैन तक आता था. इस बात की पुष्टि नानेघाट में सातवाहन वंशीय राजाओं के शिलालेख से होती है, जो मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद हावी हो गए थे. सोपारा इनके आधीन आ गया था. नानेघाट में तो बाकायदा चुंगी वसूली एवं भण्डारण हेतु प्रयुक्त पत्थर से तराशा हुआ कलश आज भी विद्यमान है.Toll Pot

बौद्ध स्तूप के चारों तरफ अच्छे से देख लेने के बाद हम लोग लौट पड़े. रास्ते में चक्रेश्वर महादेव जी का प्राचीन मंदिर एक बड़े ताल के बगल से था. यहाँ दर्शन तो पिंडी के हुए परन्तु वहीँ बेचारे ब्रह्माजी भी थे जिनकी चर्चा ऊपर की है.

वज्रेश्वरी देवी का मंदिर और गरम पानी के कुंड

October 26, 2009 by पा.ना. सुब्रमणियन

हमारे मुंबई प्रवास के समय आस पास घूमने लायक जगहों में वज्रेश्वरी के गरम पानी के कुंडों की बात चली थी. पता चला कि वहां वज्रेश्वरी देवी का एक मंदिर भी है. ज्वालामुखी से निर्मित पर्वतीय क्षेत्र है. विरार तो हमें जाना ही था सो सबर्बन (पश्चिमी) रेल द्वारा निकल पड़े थे और विरार भ्रमण के बाद भोजन कर एक मित्र, सल्वेजी, के वाहन में उनके साथ ही चले गए. विरार से १० किलोमीटर चलकर मुंबई से अहमदाबाद जाने वाले एक्सप्रेस हाईवे से जा मिले. इस हाईवे पर २ किलोमीटर उत्तर  चलकर दाहिनी ओर एक सड़क भिवंडी की ओर जाती है. इसी रास्ते पर २० किलोमीटर की दूरी पर है वज्रेश्वरी देवी का भव्य मंदिर.Outside Vajreshwari

मन्दाकिनी पर्वत की तलहटी के सुरम्य वादियों में, एक छोटी पहाडी पर कुल ५२ सीढियों को चढ़कर, सिंह द्वार को पार कर मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते हैं. वहां से चारों तरफ की नैसर्गिक छटा बड़ी लुभावनी लगी. दाहिनी तरफ दूर एक नदी (तनसा) प्रवाहित हो रही थी. एक बड़े मंडप (हाल) के आगे गर्भगृह है. जिसमें तीन देवियाँ विराजमान हैं. रेणुका, वज्रेश्वरी और कालिका.Three Devis तीनों ही मूर्तियाँ संगेमरमर की बनी हुई हैं. वहां के पुजारी बड़े ही मृदुभाषी थे. उनसे ही पता चला कि वे गिरी गोसाईं सम्प्रदाय के हैं और इसी सम्प्रदाय द्वारा मंदिर की गतिविधियाँ संचालित होती हैं. DSC04298दर्शन कर हम लोगों ने मंदिर की परिक्रमा की. वहां एक हनुमान मंदिर तथा दत्त मंदिर भी है. पीछे कुछ दूरी पर गोसाईं सम्प्रदाय के कुछ संतों की समाधियाँ भी हैं. चारों तरफ का प्रांगण साफ़ सुथरा, पत्थर के फर्श से युक्त है. कुछ कुछ जगहों पर टूटा फूटा भी है. मंदिर के बाएं तरफ ही एक नाट्य मंच (योगिनी रंगमंच) भी बना हुआ है जिसे बेलों से आच्छादित किया हुआ है. यहाँ समय समय पर नृत्य नाटिकाएं, नाटक, गायन, प्रवचन आदि का कार्यक्रम होता रहता है.DSC04299

इस मंदिर के बारे में अनेकों जनश्रुतियां मिलती हैं. पेशवाओं की राजधानी पूना (वर्त्तमान पुणे) हुआ करती थी. बाजीराव पेशवा (१) के छोटे भाई चीमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों के गढ़ वसई के किले की घेराबंदी कर रखी थी. स्वयं वज्रेश्वरी के निकट गणेशपुरी/अकलोली के पास पड़ाव डाला हुआ था. यह जगह पुणे से वसई जाने वाले मार्ग पर ही पड़ता है. यहाँ से वसई मात्र ३० किलोमीटर की दूरी पर ही है. वसई की घेराबंदी किये दो वर्ष होने को हो गए परन्तु विजय हाथ नहीं लग रही थी. चिमाजी अप्पा निराश हुआ जा रहा था.एक दिन निकट ही प्रवाहित होने वाले तनसा नदी के किनारे अपने प्रातः भ्रमण के समय  उसने पाया कि कोई एक संत जैसा दिखने वाला नदी से जल लेकर निकट के पहाडी पर जाया करता. उसे कौतूहल हुआ. दूसरे दिन वह उस संत के पीछे पीछे हो लिया. पहाडी पर पहुँचने पर संत ने अपनी कुटिया से कोई मूर्ति निकाली और अपने द्वारा लाये गए जल से अभिषेक किया. चीमाजी अप्पा धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण वहां दंडवत हो गया और उस संत के साथ उसने भी देवी प्रतिमा की आराधना की. यह सिलसिला कुछ दिन चला. कहते हैं देवी प्रसन्न हो गयी और चीमाजी अप्पा के अभियान में परोक्ष रूप से मार्ग दर्शन देते रहने का आश्वासन भी दिया.

सन १७३९ में चीमाजी अप्पा अपने अभियान में सफल रहा और वसई का किला अंततः मराठों के कब्जे में आ गया. चीमाजी अप्पा ने इस विजय को वज्रेश्वरी देवी की अनुकम्पा मानते हुए, नव नियुक्त गवर्नर शंकर केशव फडके को आदेश दिया कि गणेशपुरी के निकट पहाडी पर ही वज्रेश्वरी देवी के लिए एक किलेनुमा मंदिर का निर्माण किया जावे. मंदिर में नित्य पूजा के लिए पुणे से गिरी सम्प्रदाय के पुजारियों को नियुक्त किया गया. यह गिरी गोसाई सम्प्रदाय का पेशवा दरबार में अच्छा दबदबा रहा है तथा इन्हें उच्च पदों पर भी रखा जाता था.DSC04303DSC04302

देवी दर्शन के बाद अब गरम पानी के कुंडों की बारी थी. पता चला कि इस क्षेत्र में भूगर्भीय परिस्थितिजन्य, गरम पानी के जल स्त्रोत अनेकों हैं, यहाँ तक की तनसा नदी में भी. हम लोग २/३ किलोमीटर चलकर अकलोली पहुंचे यहाँ बाकायदा सीमेंट के कुंड बने हैं. मुख्य कुंड से जहाँ का पानी अत्यधिक गरम है, जल प्रवाहित होकर तीन अलग अलग कुंडों में आता है. इन कुंडों के गरम पानी में औषधीय गुण के पाए जाने तथा अनेकों चर्म रोगों के लिए गुणकारी होने की मान्यता है. छुट्टी का दिन न होने पर भी वहां अच्छी खासी भीड़ थी. हमने जब चित्र लेना चाहा तो कई महिलाएं कुंड के बाहर आ गयीं. हम लोगों ने भी अपने पैर डुबोकर कुछ क्षणों का आनंद प्राप्त किया. सामने रामेश्वर महादेव का एक मंदिर है. यहाँ भी दर्शन कर आगे बढ़ गए.

गणेशपुरी जो निकट ही था, एक बड़ा आध्यात्मिक केंद्र बन गया है (गुरुदेव सिद्ध पीठ). स्वामी मुक्तानंद जी यहाँ सन १९५६ में आये और उनके प्रयास से ७५ एकड़ में एक बहुत ही विशाल आश्रम बन गया है जहाँ अनेकों विदेशी आधुनिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण आवासों में रह रहे हैं और अपना भी आध्यात्मिक उद्धार करने में लगे हैं. यह क्षेत्र सर्वसाधारण के लिए वर्जित है. सड़क के किनारे ही मुक्तानंद जी के गुरु रहे स्वामी नित्यानंद जी की समाधि है. समीप ही भीमेश्वर गणेश मंदिर भी है परन्तु वे सब बंद थे अतः बिना उन सबके दर्शन किये ही वापस लौट आये. यहाँ भी गरम पानी के कुंड होने की बात बताई गयी थी. लौटते हुए रास्ते में हमने देखा कि सैलानियों के लिए अनेकों रेसोर्ट्स बने हुए हैं. विदित हो कि वज्रेश्वरी देवी एक योगिनी है इसलिए कदाचित तंत्र साधना के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त माना जाता हो.