यह शिल्प महाबलीपुरम से तनुश्री पोद्दार ने लिया है
आश्रम के प्रातःकालीन सत्र में संत ने अपने शिष्यों से पूछा “हम गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं. लोगों का मन जब खिन्न हो उठता है तो बौखलाकर एक दूसरे से बड़ी ऊंची आवाज़ में बोलने लगते हैं”. ऐसा क्यों होता है?
शिष्यों ने बहुत सोचा और फिर एक ने उत्तर दिया “क्योंकि हम अशांत हो जाते हैं इसलिए चिल्लाते हैं”
चिल्लाने की आवश्यकता ही कहाँ है जब दूसरा व्यक्ति एकदम पास ही हो. क्या यह संभव नहीं है कि हम कोमल शब्दों का प्रयोग करते हुए अपनी बात कहें. हम नाराज होने पर ही क्यों चिल्लाने लगते है. शिष्यों ने बहुत सारे कारण ढूँढ निकाले परन्तु संत किसी भी उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए.
अंत में संत ने ही साम्झाया “जब दो व्यक्ति आपस में नाराज हो उठते हैं तो उनके दिलों की दूरी बढ़ जाती है. अब इतनी दूरी से सुनाई पड़े इसलिए ऊंची आवाज़ का प्रयोग करना पड़ता है. नाराजगी जितनी अधिक होती है यह दूरी भी बढ़ जाती है और सुनने सुनाने के लिए चिल्लाना ही पड़ता है” फिर संत ने पूछा “क्या होता है जब दो व्यक्तियों में प्रेम हो जाता है” ऐसे में ये एक दूसरे पर चिल्लाते नहीं अपितु वार्तालाप बड़ी शालीनता से मृदु शब्दों में करते हैं. जानते हो क्यों? क्योंकि उनके दिल करीब रहते हैं और उनके बीच की दूरी भी कम. संत ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा “जब दोनों का आपसी प्रेम बढ़ जाता है तो उन्हें तो बोलने की भी जरूरत नहीं पड़ती, केवल फुसफुसाते है. और आगे जाकर यह फुसफुसाना भी बंद हो जाता है. वे एक दूसरे को देखते भर हैं. और संवाद पूरा हो जाता है. वे प्यार करते हुए एक दूसरे के एकदम करीब हो जाते हैं.
नंदिता प्रभु से प्राप्त इमेल पर आधारित (हिंदी रूपांतर)
तो दूसरी ओर एक टीला. ASI का सूचना फलक भी लगा था. जब हम लोग अन्दर प्रवेश कर रहे थे तो बारिश होने लगी और हमने एक बड़े पेड़ का सहारा लिया. सामने ही वह प्राचीन बौद्ध स्तूप नीले रंग के तिरपाल से ढंका हुआ था. चारों तरफ ईंट और पत्थर लाकर रखे गए थे जिनसे स्तूप के वास्तविक स्वरुप को मूर्त रूप दिया जाने वाला है. सदियों से क्षरण झेलता वह स्तूप अब कहीं संरक्षित हो रहा है, यह जान कर ख़ुशी हुई परन्तु दुःख भी हुआ कि हम उसे उसके वर्त्तमान
स्थिति में नहीं देख सके. वहां बुद्ध और साथ ही किसी बौद्ध भिक्षु की मूर्ती भी थी. हमें बताया गया कि यहाँ से निकली मूर्तियाँ, शिलालेख आदि औरंगाबाद के संग्रहालय में प्रर्दशित हैं. वहां तैनात चौकीदार सेना से सेवानिवृत्त होकर पुनः ASI की सेवा में आया था. रहने वाला तो उत्तर प्रदेश का था परन्तु उसने हमें उस स्तूप के बारे में यथा संभव जानकारी प्रदान की.

